इंतेज़ार : आखिर क्यों ?
जिंदगी में कोई किसी का इंतजार नहीं करता, हर कोई भाग रहा है, एक के बाद दूसरी भीड़ के पीछे, और तुम हो कि यह गलतफहमी पाल बैठे हो कि, कोई इंतजार करेगा, हकीकत तो यह है कि आत्मा शरीर का इंतजार नहीं करती, तो यह तो फिर भी दो शरीर हैं, क्यों इंतजार करें, किसी का, हां इंतजार तब होता है जब दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हों, लेकिन पूरे हैं, वह खुद में, तुम खुद में, फिर भी क्यों अजीब सी चिढ़ या जलन होती है, जब ये उम्मीद पल जाती है कि कोई इंतजार कर रहा है।
यह जान लो कि जन्म से लेकर मृत्यु तक तुम अकेले ही आए हो, अकेले ही जाना है, जितना खुद को इस संसार के बंधन से मुक्त रखोगे उतने ही खुश रहोगे; दरअसल, हम बांधना नहीं चाहते खुद को, लेकिन वक्त कुछ ऐसी चाल चलता है कि हमारी सारी चाल, हमारी सारी सोच धरी की धरी रह जाती है। हम देखते रह जाते हैं कि हम क्या सोच रहे थे, और क्या कर गए।
तुम सोचते हो दृढ़ता से, मानते भी हो, कि अकेले रहना, बंधनों से मुक्त रहना, तुमको तुम्हारे वांछित लक्ष्य की तरफ ले जाएगा; लेकिन, फिर पता नहीं क्या होता है, अचानक से प्राण दिग्ध हो जाते हैं, और बस हम एक ओर झुक से जाते हैं, पता ही नहीं चलता कितनी गहरी खाई है, लेकिन जब झुकते हैं और निगाहें उस आकर्षण से हटकर उसके साथ लगी खाई की तरफ देखती हैं, तब एक बार सोचने का मन करता है। देर हो चुकी होती है हम बंध चुके होते हैं और कुछ नहीं कर सकते बस लाचार होकर उस बंधन में बंधे रह जाते हैं ।
यहां तक तो फिर भी ठीक होता है, हम अपनी ओर से उस बंधन को और मजबूत कर रहे होते हैं, लेकिन यह बंधन और दर्द तब देता है, जब उस ओर से हर तरीके की ढील दे दी जाती है, कोई बहाना ही नहीं बचता हमारे पास यह कहने को कि हम उस ओर क्यों झुक रहे हैं, या हम क्यों बंधे हैं उस ओर से तो यही कह दिया जाता है, ठीक है, कोई नहीं इन शब्दों के मायने शायद उस ओर पता नहीं क्या होंगे, लेकिन तुम जो आशाएं पाल बैठे हुए हो इसलिए.तुम्हारे लिए मात्र कुछ शब्द नहीं होते, वो ठीक उसी तरह से हृदय में चुभते हैं जिस तरह से कर्ण के हृदय में सूत पुत्र कहलाना चुभता है, जिस तरह राम के दरबार में उनके दोनों बेटे उन्हीं की कारस्थानियां सुनाते हैं।
कुछ नहीं कर सकते, कुछ नहीं कर सकते, एक उपाय है बंधन में बधो ही मत, मुक्त रखो स्वयं को किसी भी आकर्षण से, ना करो जिंदगी में किसी का इंतजार, तुम काफी हो तुम्हारे लिए .......
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