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क्योंकि लिखना वक्त को तेज करना है !

मुझे अब सपने नहीं आते। जाने कितने साल हो गए होंगे। मैंने कोई नींद बिना ख्वाबों की दुनिया में सैर किए गुजरी हो। पर अब वो दुनिया मुझसे रूठ गई है।  मेरा वृत्त सिमट रहा है। मैं या तो बहुत आत्मकेंद्रित हो रहा हूं। या मेरा अस्तित्व, मुझे मेरे सिमटते वृत्त से बाहर जाने की आज्ञा नहीं दे रहा। मैं इसका हल चाहता हूं।  अब मेरे पास से हर क्षण एक बड़े दशक सा गुजारता है। मैं उस एक पल में बीतने वाली दुनिया को महसूस कर सकता हूं। और बीतने के दुख से भयानक क्या हो सकता है। जबसे मेरे सपने मेरी बीती हुई दुनिया बने हैं, तबसे मैं किसी भी चीज के बीत जाने से डरता हूं।  ये सबकुछ कितना पुराना हो गया है। सपने ही तो थे जहां मैं नया जी सकता था। पुरानी हो चुकी चीजों के साथ जीवन गुजारना कितना कठिन हो जाता है। अब तो समय भी पुराना सा ही लगता है। समय बांटने वाले बूढ़े की चरखी का सूत खतम हो गया लगता है। उसके पास से भी समय बीत गया होगा। चंद बचे धागों को छोड़ने की रफ्तार उसने भी धीमी कर दी होगी।  मैं इंतजार में हूं कि इस धीमे हो चुके आवर्त में आखिरी बार वाला सपना बचा होगा। एक लंबा सपना। जो असलियत से भी लं...

तुम्हारे लिए

प्यारी लड़की,  ये खत बहुत पहले लिखा जा चुका था। लेकिन नुमाया आज हो रहा है। इसलिए क्योंकि मैं सोच रहा था कि कैसे तुम्हें ये बताया जाए तुम आज भी वैसी ही हो। तुम उलझनों को आंखों में लिए ठीक वैसे ही उनको ठीक करने की नाकाम कोशिशों में उलझी हो जैसे तुम्हारे बालों की लट उलझ जाए तो सुलझाने लगती हो। पर दोनों में फर्क है। तुम उलझनों का हल ढूंढ रही हो, जबकि वो एक सतत प्रक्रिया है। बालों की लट कभी ये सोचकर नहीं सुलझाई होगी कि ये हमेशा के लिए ठीक हो जाएं, कभी न उलझें। नहीं ना ? क्योंकि पता है। बालों का गुण है उलझना और तुम्हारी जिंदगी का हिस्सा है उनको सुलझाना। जैसे बाल आखिरी बार कभी नहीं सुलझते वैसे ही उलझनें आखिरी बार के लिए कभी नहीं सुलझतीं।  उलझनें निश्चित हैं। तुम इसका विश्वास करो। यही उलझनें जीवन का रोमांच हैं। यहां हम सभी सपनों भरे रास्तों के राही हैं। पर सपनों से लड़ा नहीं जाता कि मंजिल क्यों नहीं आ रही है। सपने वो सत्य हैं, जिसे सत्य ने कभी स्वीकार ही नहीं किया। कितना सरल है इस बात को स्वीकार करना कि उलझनें निश्चित हैं। स्वीकार करो, उलझनें स्वयं ही सुंदर हो जाएंगी। किसी फिल्मी नायि...

हमन है इश्क मस्ताना

 तुम तो कहती थी न "तुम्हारी नस नस से वाकिफ हूँ बेटे" तो क्यूँ नहीं समझ पाई, इतनी सी बात कि फिलहाल जो हूँ, जैसा हूँ, तुम्हारा हूँ, तुम्हारे लिए हूँ ! तुम्हीं तो कहती थी न "अहा! नादान हो तुम। भोले हो। तुम्हारे और मेरे बीच खड़ी संशय की परतों को मैं यूँ ही हटा दूँगी। तुम्हें समझने के सारे स्तरों पर तुम मुझसे चकमा ही खाओगे। मैं हर स्तर पर तुम्हें तुमसे बेहतर समझती हूँ! " तो समझ लो न, क्यूँ छोड़ रही हो ?  मैं तो ज्यादा कुछ चाहता भी नहीं था। बस एक यक़ीन ही तो चाहता था, जिसकी कमी थी, वो तुमको भी पता थी। जिस रोज कहीं कोई न हो, किसी आँख में हमारे लिए जगह न बचे तब भी हम एक दूसरे के लिए वो जगह बचा के रखे रहें। हम किसी मंजिल पर नहीं जाना चाहते थे। हमें तो बस एक दूजे को नदी, पर्वत, झरने, शामों का पिघलता सोना, रातों की चमकती चांदनी, सुबह का खिलता गुलाब, कहीं बस्तियों से दूर बैठ के चाय पिलानी थी। बस इसी के आस पास के ख़्वाब थे हमारे ! या यूँ कहें मेरे।  फ़िर जाने का फ़रमान क्यों ? क्यूँ नहीं समझ पाई, कि तुम्हारे बाद मेरे पास कुछ नहीं है। ख़तम हूँ मैं इसके बाद।  मैं तो बस तुम्हारी तकलीफों क...

टेसू के फूल

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 तुम्हारे  संग की लगभग सब बैठकें याद हैं।  हमने रास्ते, चौराहे, पार्क के कोने सब जगहों पर अपनी बैठकों के साथ बैठे वक़्त को वहीँ ठहरा हुआ छोड़ रखा है। वो सब इसी इंतजार में हैं कि, एक दिन हम लौटेंगे और छूकर उनको फिर से चला देंगे। हम दोनों में से कौन अपनी भौंहें ज्यादा बार हिला सकता है इसकी प्रतियोगिता हुयी थी। मैं ज्यादा बेहतर कर पाया था शायद, लेकिन तुमने उछल उछल कर कहना शुरू कर दिया मैं जीत गयी। पता नहीं उस वक़्त ये सब इतना मामूली क्यूँ लग रहा था, और आज इस कदर याद आता है कि जहाँ रहता हूँ बस बैठ जाता हूँ, और नहीं खोना चाहता उस अतीत के सपने को, मेरी सब उम्मीदें इन्हीं छोटे छोटे सपनों टिकी हैं।  छोटे सपने कई दफ़ा इस कदर हावी हो जाते हैं कि, उनके बीत जाने का मलाल किसी सुरूर जैसे जेहन पर चढ़ता है। जैसे कोई तितली किसी फूल से लिपट जाती हो, और वक़्त कैफ भोपाली के लफ्ज़ और जगजीत सिंह मखमली आवाज में लिपट जैसे मुझसे कहता हो, "गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो / आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा"। मैं इस याद की तितली को कभी खुद से जुदा नहीं कर पाउँगा।  चलते चलते एक दूसरे क...

खत 1

   प्रिय अनुरागिनी इस खत को लिखते हुए सोच रहा हूँ, क्या तुमको पसंद आएगा ऐसे बात करने का ढंग। दुनिया ऐसी बची नहीं है  जहां खतों की बहुत जरूरत हो, पर फिर भी अपने हिस्से की दुनिया को बचाने का एक यही जरिया बचा मालूम पड़ता है। एक अरसा सा हो गया तुमसे फोन पर सही से  बात किये (यही एक जरिया बचा है इन दिनों तुमको सुन पाने का)। कई बार बहुत सारी बातें होतीं हैं करने को, मगर शुरुआत ही इस कदर खराब होती है कि कुछ कहने भर का बाकी बचता ही नहीं। ऐसा नहीं है कि तुम्हारी गलती होती है या मैं सर्वथा ही सही हूँ, लेकिन फिर भी एक गुंजाइश तलाशता हूँ उन कठोर शब्दों के बीच में, कहीं थोड़ी सी सुकून भरी आवाज कानों में पारे सी घुल जाए और कहीं न जाए। तुमको मालूम है पिछली रात जब तुमसे बात करने को जी हुआ, तो मालूम था ये मुमकिन नहीं है। सो, तुमको मालूम है मैंने क्या किया, मैंने लैपटॉप खोला और वो फ़ोल्डर ढूँढने लगा जहां हमारे शुरुआती दिनों की बातचीत की रिकॉर्डिंग थी, रास्ते में तुम्हारी तस्वीरों से मुलाकात हो गई। मैं तुम्हें बला की हसीन तो नहीं कहूँगा, पर हाँ एक तस्वीर पर ठिठक के मैं सोच पाने की शक्ति खो...

अक्टूबर : निर्मल वर्मा की कहानियों सी उदासी वाला महीना

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मनवा रोया सा बेकल हवा सा, जलता जियरा चुभती बिरहा, सजनवा आ जा नैना रो रो थके। अक्टूबर कमाल है, बेवजह भी यहां आकर दिल दुखाने को जी चाहता है। दिसंबर के दर्द तक जाने की सीढ़ी अक्टूबर कमाल है। यहां आकर, बिना पूरे पतझड़ के भी पत्तियों के दिल में किसी दिन त्याग दिए जाने का भय बैठ जाता है। अक्टूबर आते ही रातों का स्याहा बढ़ जाता है, और उदासियां अपने हुनर के शबाब पर होती हैं। असल में सर्दियां इतनी नहीं होती कि हाड़ कंपा दें, मगर जिनके पास दिसंबर की तैयारी नहीं होती अक्टूबर उनकी रूह कंपाने के लिए काफी है। अक्टूबर का बिरह अजब है। या यूं कहूं विरहियों के लिए अक्टूबर सबसे मुफीद महीना है। अक्टूबर उल्टी गिनती की पहली गिनती है। खालीपन यहां से शुरू होता है। इंसान यहां आकर जोड़ घटाव का हिसाब उंगलियों पर लगाना शुरू कर देता है। साल भर में क्या पाया, क्या गंवाया! साल के अंत यानी दिसंबर तक जाते-जाते क्या क्या हासिल कर लिया जाएगा और क्या-क्या गंवा दिया जाएगा। सब का हिसाब हथेलियों पर साफ दिखता है। अगर और कहूं तो अक्टूबर लावारिस है। जो ना गर्मी, ना सर्दी, ना बारिश, किसी का नहीं है। कुछेक दिल भी लाव...

प्रेम प्रमेय

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तुम्हारी नाक से निकलती सांस की गर्मी और आँखों और होंठों के मध्य तारतम्य बिठाती कंपन इस बात की गवाह थी कि हम कितने करीब थे।   बगल से गुजरते हुए तुम्हारी बाईं कलाई को खींच कर अपने बेहद करीब कर लिया था मैंने तुम्हारी कलाई जिसकी घड़ी मेरे हाँथ में बंधी घड़ी से टकराई और यूं इशारा किया कि आज वक़्त एकदम सही है तुम्हारे मेरे यानि हमारे इतने करीब होने का।  तुम्हारे माथे पर उभर रही रेखाएं इस बात का सुबूत थीं की मेरी कलाई पर पकड़ कितनी मजबूत थी, वो महज तुमको रोक लेने की आकांक्षा से प्रेरित नहीं थीं, बल्कि कलाई पर धड़कती नाड़ियों के सहारे आभास करवाना था मेरे हृदय और देह की हर नाड़ी में बहने वाली तुम का।                     [चित्र पर पूरा कॉपीराइट है] तुम्हारे पाँव की उँगलियाँ जूतियों में कसमसा कर रह गईं थीं, और कर भी क्या पातीं बिचारीं आज पहली बार चलते चलते यूं रोक ली गईं थीं जिनमें उनकी मर्जी नहीं बल्कि सदियों की आकांक्षा शामिल थी।  तुम्हारी भौहों की सिकुड़न तुम्हारे हृदय स्पंदन की गति का पर्याय बन गईं थीं, तुम्हारी आँखों मे...