खत 1

  

प्रिय अनुरागिनी

इस खत को लिखते हुए सोच रहा हूँ, क्या तुमको पसंद आएगा ऐसे बात करने का ढंग। दुनिया ऐसी बची नहीं है जहां खतों की बहुत जरूरत हो, पर फिर भी अपने हिस्से की दुनिया को बचाने का एक यही जरिया बचा मालूम पड़ता है।

एक अरसा सा हो गया तुमसे फोन पर सही से बात किये (यही एक जरिया बचा है इन दिनों तुमको सुन पाने का)। कई बार बहुत सारी बातें होतीं हैं करने को, मगर शुरुआत ही इस कदर खराब होती है कि कुछ कहने भर का बाकी बचता ही नहीं। ऐसा नहीं है कि तुम्हारी गलती होती है या मैं सर्वथा ही सही हूँ, लेकिन फिर भी एक गुंजाइश तलाशता हूँ उन कठोर शब्दों के बीच में, कहीं थोड़ी सी सुकून भरी आवाज कानों में पारे सी घुल जाए और कहीं न जाए।

तुमको मालूम है पिछली रात जब तुमसे बात करने को जी हुआ, तो मालूम था ये मुमकिन नहीं है। सो, तुमको मालूम है मैंने क्या किया, मैंने लैपटॉप खोला और वो फ़ोल्डर ढूँढने लगा जहां हमारे शुरुआती दिनों की बातचीत की रिकॉर्डिंग थी, रास्ते में तुम्हारी तस्वीरों से मुलाकात हो गई। मैं तुम्हें बला की हसीन तो नहीं कहूँगा, पर हाँ एक तस्वीर पर ठिठक के मैं सोच पाने की शक्ति खो बैठा था। वहाँ ठिठककर मैं सोच रहा था दुनिया को बस इतना सुकून भरा होना चाहिए।

मुझको नहीं मालूम कैसे जाहिर करते हैं, कि हम किसी की कद्र करते हैं। कैसे महसूस करवाते हैं कि वो हमारे लिए जरूरी हैं, या उनका होना भर वो एहसास होता है जिसका कोई बदल नहीं। तुम वही जरूरत हो जिसका कोई बदल नहीं, जिसका कोई सानी नहीं। वो प्यास जो कभी नहीं बुझती, शायद तुम्हारा होना भी उस प्यास को तृप्त नहीं कर सकता, लेकिन मेरे पास तुमसे बेहतर जरिया नहीं है.. फिलहाल ..

तुमको पता है मैं बमुश्किल याद कर पाता हूँ आखिरी बार हमने सुकून भरी बातें कब की थीं। पर यकीन मानो मैं उस सुबह के इंतेजार में अब भी हूँ जिसकी रात में हम सुकून से बातें करते हुए जाने कब सो जाएं और बिना कहे ही नाइट गुड हो जाए....

 

ढेर सारी मोहब्बतों के साथ शुक्रिया 



(शुक्रिया इस खत लिखने की पहली कोशिश को पढ़ने के लिए, लेकिन जाते जाते पूरे पेज में कहीं सबस्क्राइब का ऑप्शन होगा वो दबा देना, काहे की सुने हैं पैसा भी देता है गूगल.. )

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