हमन है इश्क मस्ताना

 तुम तो कहती थी न "तुम्हारी नस नस से वाकिफ हूँ बेटे"


तो क्यूँ नहीं समझ पाई, इतनी सी बात कि फिलहाल जो हूँ, जैसा हूँ, तुम्हारा हूँ, तुम्हारे लिए हूँ !


तुम्हीं तो कहती थी न "अहा! नादान हो तुम। भोले हो। तुम्हारे और मेरे बीच खड़ी संशय की परतों को मैं यूँ ही हटा दूँगी। तुम्हें समझने के सारे स्तरों पर तुम मुझसे चकमा ही खाओगे। मैं हर स्तर पर तुम्हें तुमसे बेहतर समझती हूँ! "


तो समझ लो न, क्यूँ छोड़ रही हो ? 


मैं तो ज्यादा कुछ चाहता भी नहीं था। बस एक यक़ीन ही तो चाहता था, जिसकी कमी थी, वो तुमको भी पता थी। जिस रोज कहीं कोई न हो, किसी आँख में हमारे लिए जगह न बचे तब भी हम एक दूसरे के लिए वो जगह बचा के रखे रहें।


हम किसी मंजिल पर नहीं जाना चाहते थे। हमें तो बस एक दूजे को नदी, पर्वत, झरने, शामों का पिघलता सोना, रातों की चमकती चांदनी, सुबह का खिलता गुलाब, कहीं बस्तियों से दूर बैठ के चाय पिलानी थी। बस इसी के आस पास के ख़्वाब थे हमारे ! या यूँ कहें मेरे। 


फ़िर जाने का फ़रमान क्यों ? क्यूँ नहीं समझ पाई, कि तुम्हारे बाद मेरे पास कुछ नहीं है। ख़तम हूँ मैं इसके बाद। 


मैं तो बस तुम्हारी तकलीफों को हर लेने की साधना चाहता था। किसी रोज अगर अकेला पाओ खुद को तो, मैं एक नई दुनिया सजा सकूँ तुम्हारे लिए। किसी रोज़ भूख लगे और खाने को कुछ न हो तो, अपने गुमान को इश्क़ की आंच पर चढ़ा कर तुम्हारा पेट भर सकूँ। 


आज फिरसे हिम्मत करना चाहता हूँ, मांग लेने की, उधार ही मिले चाहे ! हमारी अपनी जमीं और अपना खुला आसमान हमारा इंतज़ार कर रहा है। शुरू करो न, अभी से यहीं से, फिरसे !


ख़ैर ये फ़िजूल है ! कबीर दास कह गए हैं, हम जैसों के लिए !


हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?

रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ? 


जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,

हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ? 


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