आपके हिस्से भी कम नहीं हिस्सा

अभी तक इंतेज़ार है तो बस उन दो सफेद निशानों के नीले होने का जो जाने कितने अरसों से ज्यों के त्यों पड़े हैं.

हर बार उस डिब्बे में जाना और ये देखना आखिरी बार वो कब इधर इस गली में आयी थी, तो दिखता है बस कुछ देर पहले ही गुजरी.

फिर हमारा दरवाजा क्यूं नहीं खटकाया, पूरे दरवाजे की जांच होती है, सब ठीक है ना.

सब ठीक होते हुए भी कुछ ठीक नहीं बचता, दिल अलग राग गाता है कि मेरे सपनों की रानी आएगी मेरे दरवाजे पर.

और मन गाता है कि वो फिरकी वाली मेरे लिए हर बार अपने जुबान से फिर ही जाती है.

दोनों के बीच मल्ल युद्ध चलते ही जाता है निरुद्देशिए और यथासंभव बिना परिणाम के.

कोई हारे कोई जीते हमे कोई मतलब नहीं हमारा तो बस यही है हर बार फोन की घड़घड़ाहट या टनटनाहट पर दिल है या क्या पर वो भयानक ढंग से धड़क उठता है.

जैसे प्यासे को नहर मिल गई हो जैसे दर्द को दवा मिल गई हो जैसे अंधे को आंखें मिल गई हों जैसे जैसे जैसे..

हजार उपमाएं और उपमान अवाक् से मुंह खोले खड़े हैं उसी के इंतेजार में की वो आएगी मेरे दरवाजे पर "भी"....... नहीं गलत भी नहीं मेरे दरवाजे पर "ही" आएगी....

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