प्रेम का अर्थ (भाग-१)

प्रेम क्या है ?
प्रेम इतना जरूरी क्यों है ?
इससे पहले प्रेम की इस केमिस्ट्री को समझते हैं.

दरअसल, तुम अपने चेहरे को पहचानते तो हो और दर्पण में तुमने अपने चेहरे को देखा है. वरना बताओ अपना चेहरा कैसे पहचानते, अगर दर्पण में अपना चेहरा ही नहीं देखा होता और अचानक राह चलते तुम्हारी तुमसे मुलाकात हो जाती तो तुम खुद को कैसे पहचानते ?

खुद को देखने के लिए एक दर्पण की आवश्यकता होती है और हमारी जिंदगी में उस दर्पण की कमी को पूरा करती हैं वो दो आंखें जिन आंखों में तुम्हारे लिए आतुरता भरी होती है,
कोई आंख तुम्हें ऐसी दिखती है जैसे वो तुम पर अपना सब कुछ लुटा देने को तैयार हो,
किसी आंख में तुम वो झलक देखते हो जैसे कि तुम्हारे बिना उन आंखों में सब कुछ वीरान सा हो जाएगा,
तुम उन आंखों की हरियाली के मेघ हो,
तुम्हारे बिना सारे के सारे फूल मुरझा जाएंगे सब कुछ मरुथल हो जाएगा,

जब किसी की आंखों में तुम अपनी इतनी गरिमा देखते हो, तो पहली बार तुम्हें पता चलता है कि तुम भी सार्थक हो.
असल में तुम्हें पहली बार इस अर्थ का बोध होता है कि तुम पृथ्वी पर कोई आकस्मिक संयोग नहीं हो, तुम किसी प्रयोजन के लिए इस धरती पर आए हुए हो,
इस पूरी सृष्टि के बड़े से खेल में, एक बड़ा सा दायित्व या उत्तर दायित्व तुम्हारा भी है.

इस पूरी दुनिया का मंच तुम्हारे बिना अधूरा है, चलो मान लो तुम इस दुनिया में नहीं हो तो कोई कमी नहीं होगी, लेकिन इतना तो है कि कम से कम एक हृदय तुम्हारे बिना रेगिस्तान हो जाएगा,
तुम्हारे बिना एक हृदय की वीणा का सारा राग खो जाएगा,
तुम्हारे बिना एक कविता का सारा सौंदर्य नष्ट हो जाएगा,
उस हृदय में झांक कर के तुम्हें पहली बार अपने मूल्य का आभास होता है.

प्रेम बिना तुम अपने होने का कोई कारण नहीं ढूंढ पाओगे, तुम खुद को ना ही व्यर्थ पाओगे, बल्कि अनुभव करोगे कि हजारों आंखों में तुम एक दुर्घटना से ज्यादा, एक अपशकुन से ज्यादा, कुछ नहीं नजर आ रहे हो,
तुम्हारे ही कारण इस पूरी दुनिया में दुर्भाग्य के चिन्ह पड़े हैं तुम ही हो इन दुर्भाग्य की चीखती, पुकारती, करुण आवाजों की वजह, तुम सदा ही खुद को इन आवाजों के नर्क में ही पाओगे.
प्रेम ही है जो तुम्हें इन आवाजों के नर्क से बाहर निकालेगा.

दरअसल प्रेम तुम करते नहीं हो, यह हो जाता है, घट जाता है, तुम मात्र इतना कर सकते हो कि इसमें कोई बाधा ना डालो,
जब प्रेम घट रहा हो तो तुम भाग मत जाओ, जब प्रेम घट रहा हो तो तुम पीठ ना घुमा लो, जब प्रेम घट रहा हो तो तुम आंखें ना बंद करो, बस केवल इतना करो कि प्रेम के पागलपन और अंधेपन को जियो, क्योंकि प्रेम का कोई पता नहीं है, कहां से आता है, कहां ले जाता है.

यह अनजान की पुकार है इसके लिए कोई तर्क नहीं लगाना है, मैं इस व्यक्ति को प्रेम करूं या ना करूं यह तुम्हारा विषय नहीं है तुम्हारा विषय है कि बस उस प्रेम के साक्षी बनो, दिमाग को नहीं दिल को काम पर लगाओ क्योंकि दिमाग तो.......

(१/२)

Comments

  1. ❤शानदार और प्रेमदार😍

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  2. I am really surprised by the quality of your constant posts.
    Hi. Sir.. You really are a genius, I feel blessed to be a regular reader of such a blog Thanks so much.. -অনলাইন কাজ💕💋 font copy and paste
    muchLove quotes in hindi
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