तब तुम आना मेरे पास
जमाना जब ठोकरें देकर
या उलहनों से दबा देगा
हार जाओगी खुद से
और तोड़ देगा खुदा भी यकीं तुम्हारा
नज़रों में खटकने लगोगी
राहों में भटकने लगोगी
तलाश बनकर रह जाओगी
गुमशुदा हो जाएगा होश
सपन भी सब धुंधला जाएंगे
रातें काट खाने दौड़ेंगी
सन्नाटा सांय सांय करेगा
अकेलापन बगल में आहें भरेगा
सारे अपने पराए होंगे
अपना वक्त काट कर चले जाएंगे
किराए की खुशियां जो हैं
एक बार फिर वो गुम जाएंगी
फिर एक जोड़ी अकेली आंखें और
झर झर झरते आंसुओं का सैलाब
दिल की धड़कन तेज़
और बौराया हुआ दिमाग
कुछ ना सूझेगा तुम्हें जब
तो एक काम करना
चुप चाप फिर वापस आना
मेरे पास
यहीं कहीं बैठा मिलूंगा
वक्त की रफ्तार और तुम्हारी याद
दोनों में तालमेल बिठाते
खुद को बताते कोई बहाना
तुम्हारे जाने का, और समझाते
कोई मजबूरी रही होगी
जो तुम चली गई होगी
वर्ना हां
बहुत प्यार था हम दोनों में
हम दोनों में -- शायद
अब मेरी बात खत्म होगी
और वक्त जो चुपचाप
आजतक सब देखता आया है
धीरे से कान में एक बात बोलेगा
"कोई मजबूरी होगी
जो तुम आज वापस अाई हो"
इतने सालों में वो पहली बार बोलेगा
पर मैं दरकिनार कर दूंगा उसे भी
और ये बोल के
चलो तुम वापस तो अाई हो
फिर उसी किरदार में आ जाऊंगा
जिसमें तुम्हारे जाने से पहले
मैं रहा करता था
हर पल, हर जगह, हर बात में...
एक सवाल है बस
तुम्हे वो किरदार याद तो होगा ना...
इतनी सुंदर रचना किसके लिए की गई हैं अनुराग महोदय
ReplyDeleteजब रचना इतनी सुंदर है तो जिसके लिए रची गई वो कितना सुंदर होगा , तो शब्दों में बयां कर पाना जरा मुश्किल है 😍🙏
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