मेरी किताबें : जिंदा लाशें

जिंदगी की लाइब्रेरी में
एक दिन एक पढ़ाकू आया
मैंने खोल दिए
सारे पन्ने अपने
सारी किताबें
सामने उसके
बड़े मन से एक
टेबल पर वो बैठा
एक एक कर
सारी किताबें पलटी
और बिखेर कर सब कुछ
चल दिया
नए सफर ए मुकाम पर ।

मेरी लाइब्रेरी की किताबें अब
नहीं है बिखरी
सांवर दी है मैंने
सब समेट कर
सजा दिया है
बस एक ही निवेदन है
कोई मत आना
पढ़ने अब मेरी किताबें
खोलोगे पन्ने
कुछ पाने को
लेकिन
वहां हैं केवल और केवल
दुख दर्द आहें आंसू
अब मै तुमको इससे ज्यादा
कुछ नहीं दे सकता
गलती से भी अब
किताबें ना पलटना
क्योंकि
अब वो जिंदा लाशों
के सिवा और कुछ नहीं हैं ।

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