झूठ । lie
झूट कहने लगा सच से बचने लगा
हौसले मिट गए तजरबा रह गया
हिलाल फ़रीद
झूठ उससे इतनी नफरत क्यों है ? मुझे या मुझ जैसे कई लोगों को ...
इससे पहले जानते हैं झूठ क्या होता है ? "झूठ एक ज्ञात असत्य है जिसे सत्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है"
अर्थात कहने वाला यह जान रहा होता है कि वह असत्य बोल रहा है किंतु या तो वह सामने वाले को नासमझ मानता है या हकीकत में सामने वाला नासमझ होता है.
जिसके सामने वह बड़ी साफगोई से उस असत्य को सत्य के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहता है और यदि सामने वाले ने स्वीकार कर लिया तो वही असत्य - सत्य बन जाता है.
किंतु यहां बात मैं अपनी व्यक्तिगत की और व्यक्तिगत जीवन में झूठ बोलने वालों की कर रहा हूं.
मैं एक हद से ज्यादा सोचने वाला व्यक्ति हूं, जिसके तमाम नुकसान-फायदे समय-समय पर देखने को मिलते रहते हैं.
उन्हीं में से एक है, झूठ का मनोविज्ञान समझना, और जहां तक मेरा झूठ का मनोविज्ञान कहता है कि कोई व्यक्ति झूठ तब बोल रहा होता है-
जब वह तुम्हारे प्रश्न का उत्तर "छोड़ो ना" से शुरू करके किसी और बात पर ले जाकर, फिर अपने मसालेदार झूठ को उत्तर और सत्य के रूप में प्रस्तुत करके, आपसे इस जवाब की उम्मीद करता है "ओहो" , "अच्छा यह बात थी", "चलो कोई बात नहीं" आदि आदि.
अब मेरे लिए यह कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं है, कि मैं समझ सकूं किसी के झूठ और सत्य को, लेकिन मैं उसे बता कर कि मैंने तुम्हारा झूठ पकड़ लिया है क्या हासिल कर लूंगा.
और यदि वह मेरी बातों से बदलने वाला था तो साथ रहे चाहे 10 दिन हुए हो किंतु जो तमाम ज्ञानी लोगों की बातें मेरे दिमाग में चक्कर काट रही होती हैं, वह भी उसके लपेटे में आकर कुछ तो बदल जाता.
और यह समझ जाता दरअसल एक सच बोलने वाले इंसान के लिए, झूठ को पकड़ पाना कितना आसान होता है, बिलकुल वैसे ही जैसे असली सोना बेचने वाला नकली सोने को देखते ही पकड़ लेता है.
किंतु मैं भी देखना चाहता हूं उस व्यक्ति का ढीठपन तो उसी के मन मुताबिक उत्तर देकर उसे खुश कर देता हूं, और वह इसी भ्रम में- "असत्य को सत्य मनवा लेने के" आत्ममुग्ध होकर खुश हो जाता है.
और अव्वल तो दुनिया में उपलब्ध ज्ञान का एकमात्र उद्देश्य है, मानव मात्र को प्रसन्न रखना. चाहे उसके लिए किसी एक को समस्त दुखों का उत्तरदायित्व झेलना पड़े और मैं झेल लेता हूं.
मगर जैसे वह असत्य को सत्य का चोला पहना कर आता है वैसे ही मैं भी उस व्यक्ति के सामने कभी असली नहीं जाता हूं, मैं भी जब उसे मिलता हूं तो एक चोले के भीतर ही मिलता हूं.
क्योंकि मैं उस नफरत को ना जाहिर करता हूं और ना करूंगा- जो उस झूठ के प्रति है, क्योंकि मानव मात्र से नफरत मैं नहीं कर सकता.
मुझसे मिलना है, मेरे अनुराग से मिलना है, तो कुछ नहीं बस सरल हो जाओ, जैसे हो वैसे ही रहो, लाख कमियां हो बस एक अच्छाई ले लो कि सच बोलो.
तब मुझसे मिलने में कोई दुविधा नहीं है, तब तुम उस अनुराग से मिलोगे जिसकी कल्पना तुमने अपने किसी सपने में भी नहीं की होगी...
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