वेटिंग टिकट और स्लीपर डिब्बा (भाग १)
वेटिंग टिकट और स्लीपर डिब्बा
मतलब पहले ही अपनी इंटर्नशिप की बधिया उखड़ी पड़ी है, और हॉस्टल वालों ने बेघर किया है, और आदतन मिलने वाले नुकसान जिनका कोई माई बाप नहीं.
ये सब कचड़ पट्टी बटोर के और दिल्ली से वापस आकर इंटर्नशिप कैंसिल कर दी, शांतिकुंज में डॉक्यूमेंट्री शूटिंग के बहाने रुकने की इजाजत लेकर, स्टाइलिश राजू शर्मा फोटावाले के साथ रुके, दिनभर खाना, सोना यही दो मूल काम किया, दस की सुबह बिना सोई रात से उठकर टिकट खिड़की पर लाइन लगाई, और अब शुरू हुई असली बमचक, अर्ची पर्ची फाड़ के दबंगई से कुछ अबला महिलाओं ने आगे से कब्जा किया और टिकट बाबू के क्या कहने, हर काम में जय श्री राम बुलवा के काम करने वाले ने ये अनर्थ देखा और मौन साध रखा.
पहला तो हम अयोध्यावासी तहज़ीब वाले, भाईसाहब दबंगई सह ली लेकिन अंदर के पत्रकार और बावली को एकदम नहीं जगाया, चुपचाप 122 की वेटिंग लेकर शांतिकुंज की परम शांति में पहुंचे, राजू भाई के साथ सफ़र शुरू करना था सो समान वामान बांधा हमारा तो एक बैग भाईसाहब का कैमरा झोला बकाया बवाल मिला के तीन बैग जो कहां कहां टांग के चले और टेंपो पकड़ के बिना मोल भाव के तीस रुपए दिए जो हम अमूमन नहीं करते फिर भी दिए और धिचिक धीचिक चल के स्टेशन पहुंचे.
बारह बजे की उपासना ट्रेन है और हम दस बजे पहुंचे, दिल नासाज़ था, सो वॉट्सएप पर स्टेटस, शायरी वाले धुआंधार लगा डाले, जो पता नहीं कौन पढ़ता या कौन स्वीप करता है, फिर भी लिख डालते हैं
तो ये थी कहानी की भूमिका अब मुद्दे पर आते हैं, हम बिना टिकट नहीं हैं पूरे तीन सौ पंद्रह का स्लीपर का टिकट है लेकिन एस सेवन के बाकी यात्रियों वाला ताव हमारे मुंह पे नहीं है, पता है काहे, काहे की उनका कन्फर्म है हमारा वेटिंग, रूट डायवर्ट था तो भीड़ कम थी और हम आसन जमा के बैठ गए और भगवान के यहां अर्जी लगा दी देखो भगवान अगर आज तक कुछ पुण्य किया है तो पूरा कैश बैक दो की सीट पर कोई ना आए, भाई साहब बोलने की देरी थी कि लम्बोदर धारण किए साढ़े तीन फुट के अधेड साहब पहुंच गए, मुंह पान से लाल हुआ जा रहा था उन्होंने एक बार जीभ के जरिए पान में मिक्सी जैसा कुछ किया और फिर गुड गुड गुड गुड करते हुए ट्रेन की पटरियों पर थूक दिया मानो अपना ऑटोग्राफ दे दिया हो, फिर हम से मुखातिब होते हुए बोले चलिए उठिए यह हमारी सीट है, बेगैरत इंसान को मेरी तो ठीक राजू की मासूमियत पर भी तरस नहीं आया और हम 2 वेटिंग टिकट धारी बिना घरबार के उसी डिब्बे में भटकने लगे और मैं जिसने कसम खा कर रखी थी कि भैया डिब्बा तो छोड़कर नहीं जाएंगे कुछ भी हो जाए और इसमें वह वाला एंगल ना तलाशा जाए कि कोई खूबसूरत मल्लिका ए हुस्न रही होगी काहे की बिहार और यूपी के उस वाले रूट पर कुछ उस वाले टाइप के लोग नहीं पाए जाते हैं और जो पाए जाते हैं वह एसी वाले डिब्बों में होते हैं, और जनरल लोगों के लिए जनरल डिब्बा ही बने हैं हम थोड़ा औकात से ऊपर उठकर स्लीपर में घुस गए थे, वहां से मिर्जा गालिब का शेर याद करते हुए कि
"हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
.
.
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले"
उनके कूचे से ज्यादा दूर नहीं गए बगल के साइड लोअर पर स्थान जमाया जहां ट्रेन छूटने के 5 मिनट पहले तक कोई नहीं आया था हमने राजू ने फिर से एक बार अपने पुण्य कर्मों को याद किया और भगवान को धन्यवाद किया चलो मालिक कुछ तो मदद की लेकिन गालिबाना माहौल में जॉन एलिया के जैसे कूदना हुआ उस शख्स का इस बार लंबोदर - ठिगने नहीं थे हम से 1 इंच छोटे, चौड़ाई में भी थोड़ा कम लेकिन अकल से ज्यादा चौड़ थी. लेकिन तुनक मिजाजी की वजह से उन्होंने भी हमें बड़े बेगैरत अंदाज में वहां से रवाना किया, हम राजू साथी बाराती सारा सामान उठाए और किसी और सीट की तलाश में निकल गए तभी दूर लाइट में एक पान खाया हुआ चेहरा चमका नाना और लंबोदर वाला नहीं इस बार काले कोट वाला और सीने के पास में कुछ चमकता हुआ लगा हुआ था वह दिखा मानव उम्मीद की किरण नजर आई वह थे टीटी भाई साहब उनसे बात करी और कहा 1 सीट का इंतजाम करवा दो उन्होंने मुरादाबाद तक रुकने की बात कही और फिर इंतेज़ाम देखा जाएगा.
रात के 1:00 बजे भयंकर नींद आंखों में छाई हुई थी और हम एकदम कोई ठिकाना तलाश रहे थे जहां टिकाएं और सो जाएं कैसे भी, आखिरकार वो जगह मिल गई 37 नंबर सीट नहीं मिली उसके बगल जमीन बैठने की जगह मिली और हमने यही नियत मानते हुए चुपचाप स्वीकार किया और बैठ गए......(टू बी कंटिन्यूड...)
Comments
Post a Comment