मैंने देखा नहीं है भगत सिंह को
मैंने देखा तो नहीं है भगत सिंह को
और ना ही मिला हूं
पर महसूस किया है
हर उस बार जब
कोई बोलता है इन्कलाब जिंदाबाद
भारत माता की जय, वन्दे मातरम्
जब कोई सत्ता के बहरे कानों के खटमल
बारूद की झन्नाहट से निकलता है
और कहता है
बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है
जब कोई चलता है
और झेलम, गंगा लहरा उठती हैं
जब कोई सत्तर साल बाद भी
बीस का गबरू जवान रहता है
जब कोई जिस्म ख़ाक हो जाता है
और रूह खयाल बनकर नस्लों में जागती है
जब दादी की कहानियां मां की लोरियां
वीर भगत सिंह की गाथा गाती हैं
जब मूछों का ताव तिरछी टोपी
भगत सिंह बन जाती है
और भगत सिंह चला भी जाता है
तब जब
आजादी सोच नहीं, लफंगों का नारा बन जाती है
तब जब
बारूद अपनी सनक को साबित करने का जरिया बन जाएं
तब जब
भगत सिंह दिल से निकल छाती पर चिपक जाएं
तब जब
भीड़ तंत्र बन सर्वशक्तिशाली बन बैठे
तब जब
गलत सही सही गलत बन समाज में इठलाए शर्माए क्रमशः
तब जब
कलमें सच को सच जैसा ना लिखें झूठ के साए में
तब जब
आपकी हमारी अपनी चेतना मर जाए
तब जब
हमारे सवाल सहम कर घुटन में मर जाएं
तब जब
चमनजरों की आबरू माली लूटता और
किसी की हलक से चूं तक नहीं निकलती
तब जब
हे राम - या अल्लाह की आवाज
किसी राम भक्त या अल्लाह के
नेक बन्दे की गोली के शोर में कहीं गुम हो जाती है
#Anuragvaani भगत "सिंह"
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