अयोध्या हो तुम

अयोध्या, जिसे राम ने नहीं पाया,
अयोध्या, जिसने राम को पाया
वैसे ही मैं तुम्हें नहीं पा सकूंगा, तुमको मुझ को पाना होगा.

और अयोध्या ने मात्र राम को अस्वीकार कर दिया, अयोध्या के योग्य होने में राम को चौदह वर्ष के वनवास लगे, मुझे शायद इतने नहीं पर कुछ वर्ष तो काटने ही होंगे.

अयोध्या जीतने की चीज नहीं है, जीने की चीज है,
अयोध्या यानि अयोध्य, जो युद्ध के काबिल न हो, जो युद्ध से हासिल ना हो, जो किसी भी कोशिश से ऊपर हो, तुम तप का हासिल हो सकती हो, यतन का नहीं हो.

अलबत्ता, जिसका हासिल तुम हो उसका कोई और हो ही नहीं सकता, तुमको पाना किसी नगीने को पाना है, तुम्हारे एवज में अगर, हजार ब्रह्म कमल के गुलदस्ते भी मिलें तो अस्वीकार कर दूं, मेरी हसरत में गर तुम हो तो, मुझ मुर्शिद को और किसी हसरत की जरूरत क्या है.

तुमको पाने की राह तमाम मुश्किलें समेटे है, वो किसी गांव की बरसाती पगडंडी जैसी है, जिसपर बेहद संभल कर चलना है,
तुम्हारा चेहरा मेरी आंखों का रौशनीघर है, वो जो समुंदर के बटोही को सारे जहान में सिर्फ दिखता है, तुम मेरे भीतर के संगीतज्ञ का वो सुर हो जिसे पाने के बाद कुछ भी नायाब नहीं बचेगा, पाने को.

सुनो ! तुम केवल एक लड़की नहीं हो, कम से कम मेरे लिए तो बिल्कुल ही नहीं, फिर से तुम अयोध्या ही हो, बस वही अयोध्या जो इतने अर्थ समेटे है जिसके बाद सारे अर्थ, निरर्थक हो जाएं...

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