सुरमई रात का हसीन ख़्वाब

हां मैं कलमकार हूं, कल को आकार देते-देते बहुत कुछ बिगाड़ रहा हूं, शायद किसी से प्यार कर रहा हूं.

वो प्यार जो ना कह सकता हूं, ना कह सकूंगा, फिर भी इतना ही सच है कि उसके बिना ना रह सकूंगा.

वो मेरी जरूरत में शामिल हो गई है, मेरी जरूरतें हैं, जैसे उसकी आंखों में देखना, हर वक्त बहुत कुछ सोचना, वो जो रहे तो ठीक, ना रहे तो बहुत खोजना.

मैं खाली कागज पर उसे ही तलाश रहा हूं, कहने को यह है कि मैं उसे बिसार रहा हूं, पर अपनी रूह के कोने-कोने में उसे पसार रहा हूं.

सुरमई रात का हसीन ख्वाब, दूधिया चांदनी से भी आगे का शबाब, उससे मेरा जो भी मरासिम है वो मैं बयान नहीं कर सकता, पर इतना है कि उसका इम्तहान नहीं ले सकता.

उसके डूबते सितारे संग मेरा सब कुछ डूबता है, वो एक पल को गुम हो जाए तो मेरा चैन-ओ-सुकून लूटता है.

हां अजीब है, मेरी आंखों में देखकर शायद वो सब कुछ देख सकता है, पर ना जाने क्यों देखता ही नहीं, या हो सकता है, देखकर सोचता ही नहीं.

होठों की सुर्खियां, आंखों के कोर, गालों के गड्ढे, बालों की महक, कलाइयों की लचक, तमाम सब देखता, बस मैं सोचने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता.

मैं हसरतों का कैदी हूं, सपनों का मुजरिम हूं, मंजिलों का गुलाम हूं, मैं कहने को बस इंसान हूं...


Comments

  1. बेहद शानदार। हर आशिक़ के दिल को कुरेदने वाली पंक्तियां।

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  2. बेहतरीन...ऐसे ही लिखते रहो♥

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