तुम ना दिसम्बर हो

तुम ना दिसम्बर हो
कोहरे की चादर में लिपटे कुछ खयाल
तमाम बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियां
वैसे जैसे चमकीली सफेद टोपी से ढका तुम्हारा सर
बदन पे लपेटे तुम्हारा खुश्बू का लिबास
और तमाम यादों की वो जानलेवा अंगड़ाई
वो बर्फ-सी जम-जम जाती सब सांसें
और तुम्हारी सांसों में सरसराती गर्मी
पलकों के कोरों से झरती कुछ आहें
और आंखों से मोतियों की बेइंतहां बरिशें
तुम्हारी यादों की तमाम सरगोशियां 
तेरी आंखों की नमकीन-सी शरारत
कोमल कपास के छुवन सी बाहें
आलिंगन में लिपटी प्रभात की किरन से
तमाम सर्द रातों का जर्द खयाल 
अनगिनत अरमानों का सुलगता अलाव
तमाम लफ्जो की बंदिश में से निकलती ग़ज़ल
उफुक के आखिरी मंजर के नज़ारे की नजर 
तसव्वुरात के आंगन में उतरा चांद
और गुलाबी सीढ़ियों पे ढलकी रौशनी 
तमाम फलसफा-ए-कायनात से इतर
तुम ना दिसम्बर हो

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