जॉन यानी फलसफा ए जिंदगी

जॉन एक ख़ूबसूरत जंगल हैं, जिसमें झरबेरियां हैं, कांटे हैं, उगती हुई बेतरतीब झाड़ियां हैं, खिलते हुए बनफूल हैं, बड़े-बड़े देवदारू हैं, शीशम हैं, चारों तरफ़ कूदते हुए हिरन हैं, कहीं शेर भी हैं, मगरमच्छ भी हैं।
                       चित्र - साभार गूगल
जॉन आपको दो तरह से मिलते हैं, एक दर्शन में एक प्रदर्शन में । प्रदर्शन का जॉन वह है जो आप आमतौर पर किसी भी मंच से पढ़ें तो श्रोताओं में ख़ूब कोलाहल मिलता है। दर्शन का जॉन वह है जो आप चुनिंदा मंचों पर पढ़ सकते हैं और श्रोता उन्हें अपने घर ले जा सकते हैं। जब कुमार विश्वास ये लिखते हैं तो जानेमन जॉन के लिए मैं बस इतना ही सोच पाता हूं "जॉन - जिंदगी"

कुछ एक वो शेर जो वारदातन मेरी जिंदगी के हिस्से बन बैठे

मैं जो हूँ 'जौन-एलिया' हूँ जनाब 
इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा
      खास लोगों ने लिए कोई हड़बंदियां नहीं हैं, मगर जब उनके अलावा कोई पार करके घुसना चाहता है तो उसके लिए काम आया ये शेर

बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या
      जरा कमजोर दिल का होने के नाते बचता हूं, मगर यक्सर जब कोई नजदीक आता है तो ये शेर काम आया दूर करने के

किस लिए देखती हो आईना 
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो 
     अब क्या ही बताएं माशूक को खुश करने के लिए इससे बेहतर तोहफा एलिया साहब क्या दे सकते हैं

मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ 
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से 
       किसी से बताना तो अलग बात है, लेकिन हर बार बहुत बोलने बाद अंदर के सन्नाटे को जीते हुए ये शेर उसमें जिंदगी भर देता है

जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
      जब जिंदगी की लगी पड़ी हो तो जिंदगी को डेडिकेट करने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है

मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
        कुछ नहीं बस इतना की  इसपर कुछ कह ही नहीं सकता मैं पढ़ के अजीब जुड़ाव महसूस होता है

मिल रही हो बड़े तपाक के साथ 
मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या
       कमजोरी होती है उनकी जो एलिया साहब को जिंदगी मान लेते हैं उनके साथ और जब भी कोई जरा भी कुछ वो करता है जिसकी जरूरत नहीं तो टपक पड़ता है ये शेर




नया इक रिश्ता पैदा क्यूं करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूं करें हम

इसी शेर के साथ अलविदा आज के लिए इतना ही

साभार-वाणी प्रकाशन
"मैं जो हूं जौन एलिया हूं"

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