बचिए अपने नायकों से और पोस्टर नेताओ से

बरखा दत्त जिनको हीरो की तुलना में शीरो कहती हुयी नजर आती है, साथ ही रविश कुमार भी जिनके पुरजोर समर्थन में नजर आते हैं, लेकिन उसके बाद लदीदा सखलून की एक फेसबुक पोस्ट आती है और उसके बाद होनी शुरू होती उनपर और उनकी तथाकथित क्रन्तिकारी साथी पर रिसर्च और रिसर्च में जो भी बातें सामने आयी दरअसल वो बेहद चौकाने वाली थी और ये बताने वाली थी की जितनी जल्दबाजी में हम अपने पोस्टर बॉय और गर्ल चुन लेते हैं दरअसल में जारा जांच लेना चाहिए क्योंकि कहीं ऐसा न हो की फटा पोस्टर निकला जीरो, आइये एक नजर डालते हैं इनकी सम्पूर्ण कुंडली पर
पहले लदीदा सखलून, इनकी फेसबुक प्रोफाइल चरमपंथ का समर्थन, चरम स्तर पर करती हुयी नजर आती हैं और हालिया फेसबुक पोस्ट में इस्लाम के प्रति अपनी  वफादारी सिद्ध करती नजर आती हैं और आगे वो कहती हैं की हमें यहाँ की धर्मनिरपेक्षता में यकीं नहीं हमको इस्लाम और इस्लामिक जिहाद को समझना जरुरी होगा
चंदा यादव, दूसरी लड़की इस पूरी कहानी जिसकी लेखिका वामपंथी मीडिया और बरखा दत्त थी उन्होंने उसका इस्तेमाल इसलिए किया ताकि ये दिखाया जा सके की यूपी की एक लड़की जिसको उसके परिवार से रोका गया लेकिन संघर्ष की गाथा का गौरव गान करने के लिए कोई ऐसा किरदार चाहिए जो तमाम हालातों से संघर्ष करके अपने सपनों की टूटन गा सके और बस इतनी कहानी थी चंदा यादव की
आखिरी लड़की की बारी  आयशा और जब इनकी कुंडली खुली तो 31 जुलाई 2015 का ट्वीट सामने आया जिसमे वो याकूब मेमन से माफ़ी मांगती नजर आयी की वो इस्लाम के महान क्रान्तिकारी जिसने लगभग 300 लोगों की मुंबई में 1993 में एक साथ मर दिया था, और पता नहीं कौन सी इस्लामिक किताब में पढ़े जिहाद को सिद्ध किया था, उससे ये कहती नजर आती हैं की माफ़ कर दो मैं तुमको इस फांसीवादी देश में बचा नहीं सकी मैं अभी असहाय हूँ, और जब थोड़ी काबिल हुयी तो कठुआ बलात्कार पर राष्ट्र को कठुआ बलात्कार पर बीच वाली ऊँगली दिखती हुयी पोस्ट डाली जिससे ये साबित हुआ कि हाँ अब मैं सक्षम हूँ और इस फांसी वादी देश में बहुत कुछ कर सकूंगी और उनके पति  की प्रोफाइल खंगालने पर सत्ता ताकत के विरुद्ध अफजल गुरु के उस संघर्ष को सलामी देते नजर आते हैं जिसकी वजह से तमाम दुनिया न जाने कब तक आतंक के घेरे में रही
दरअसल ये तीनो जिस वीडियो से वायरल हुई अगर गौर से देखें तो वहां प्रदर्शन खास नही था ये चार पांच लोग एक गली से आते हैं, पुलिस असम से आये लड़के को खीचती है पिटाई शुरू होती है और ताज्जुब जहाँ कोई प्रदर्शन नहीं हो रहा था वहां पर चार लोगों को कवर करने के लिए आठ कैमरे मौजूद थे, यानि ये एक्सीडेंटल क्रन्तिकारी नहीं हैं बल्कि एक पटकथा के सबसे सही प्रस्तुतिकरण का नमूना हैं, हमारे देश में आजकल ऐसे ही नायक तैयार किये जा रहे हैं, जागरूकता जरुरी है, कुछ भी आखिरी सच नहीं होता,और खासकर के आजकल के पोस्टर बॉय और गर्ल्स

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