हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं तोड़ा करते
बहुत पहले गाना आया था, जगजीत साहब की आवाज, गुलज़ार साहब की नज़्म, नज़्म थी "हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं तोड़ा करते, वक्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते",
खैर जिंदगी के टुकड़े समेटने की जल्दी में जाने कब भूल गया कि जिंदगी और हम जाने कितने अलग हो गए, हाथ छूटने से रिश्ते छोड़ना मेरी फितरत में नहीं, मेरी तो फितरत है बेइंतहां मोहब्ब्त, चांद सितारों के वादे महज वादे ही होते हैं, एक तुमसे वादा करके सबसे मुकरने को जी चाहता है, तमाम उदासियां से घिरकर भी तुम्हारे संग मुस्कुराना चाहता हूं, और जहां लम्हों के सरीखे लोग गुजर रहे हैं वहां बस तुम्हारा हांथ थामे तमाम उम्र के लिए वक़्त की कदमताल से मुंह मोड़ लेना चाहता हूं, किसी ने कहा है कि पहाड़ पर चढ़ने का एक असूल होता है के हमेशा झुक कर चढ़ो दौड़ो मत जिंदगी भी हमें बस यही सिखाती है, सच में मैं थक जाना चाहता हूं बहुत भागा हूं, थमना है, बिल्कुल घुप्प अंधेरे सरीखा जो उजाला भूल चुका है, किसी जमे हुए झरने सरीखा जो बहना भूल चुका है, आंखों की लाख इलतिजाओं के बीच मोहब्ब्त से लबरेज एक शाम पे कुर्बान होने को जी चाहता है, किसी भी लिपि और आरूज से परे जाकर मुझे बस लिखना है तुम्हारी पीठ पे आखिरी लफ्ज़, मोहब्ब्त
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