संवाद भाग ०१ - मोहन प्यारे बनाम पार्थ
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#मोहनप्यारे बनाम #पार्थ
सुनो मोहन प्यारे, ये जगत आखिर है कौन सी चरस मरे पल्ले नहीं पड़ रहा, कुछ ज्ञान दो बे"
लगभग झल्लाये हुए पार्थ का आगमन, हताशा की लकीरों से ज्यादा चिंगुरा हुआ बुशट पहने धड़ाम से खटिया पर लोट गया, शायद किसी लंपटलाल नेता की रैली से आया है, और #भैया_जी_के_साथ_फुरसत_के_पल वाली सेल्फी नहीं ले पाया है, सो आकर मुझ सकल चराचर के स्वामी पर ताव झाड़ रहा है, खैर हम दोनो एक दूजे के पूरक हैं, काहे की आज इमोटिकॉन्स के दौर में हमारा हे पार्थ और ब्ला ब्ला वाला लम्बा डॉयलोग कोई सुनता नहीं और पार्थ को इमोजी भेजने नहीं आता सो हम दोनों एक दूजे का ज्ञान और दर्द क्रमशः सुनते हैं, खैर देखते हैं आज किस विषय पर चर्चा होगी, फ़िलहाल पार्थ अब कांच की बोतल में भरे गुलाबी पानी को पीकर तैयार है, मैं भी तैयार हूँ ज्ञान बांचने को काहे की दूरबीन से देखने पर भी कोई अज्ञानी नजर नहीं आता जिसको ज्ञान दे सकूं, पता नहीं सबके हाँथ में वो पांच इंच के यंत्र की गुप्त यूनिवर्सिटी से कौन सा ज्ञान रस टपकता है, जो मेरे गीता सार से ज्यादा है.
खैर, पार्थ के पास जिओ जिंदाबाद नहीं है, क्योंकि उसके यहाँ गुलाबी पानी बड़ा मंहगा है, बहरहाल बहरक़ैफ़ यह तो रहा सूत्रधार वाला संवाद अब पर्दा उठने का वक़्त हो चला है
पार्थ- (लगभग उठते हुए दुबारा गिरने के लिए) अबे मोहनवा ! ई कर्म का कौन सा झमेला है ?
मैं यानि मोहनवा- (पीछे संखनाद होता हुआ, फील के लिए चाइना मोबाइल पर बजा दिया) हे पार्थ ! तू नहीं जनता, तू खाक भी नहीं जनता, और ज्यादा जानकर और समझदार बनने की कोशिश न कर, क्योंकि अभी तू नहीं जनता, तू भुनगा है, भुनगा भी नहीं जनता तू, यानि यक़ीनन तू कुछ नहीं जनता, ज्यादा लपड़ चपड़ न कर, कर्म तेरा विषय नहीं है.(अपने मुकुट तक हाँथ ले जाते हुए)
पार्थ- (फिर से उठने की कोशिश करते हुए) बे भन्ना कहे रहे हो, अच्छा सुनो मेरा विषय क्या है ? यही बता दे यार
मैं यानि मोहनवा- हे पार्थ ! (इसके बिना स्टार्ट नहीं हो पाता ) ज्ञानेंद्रियों द्वारा प्राप्त रस, पदार्थ या तत्त्व (जैसे—गंध और स्वाद) कल्पना, विवेचन, इंद्रिय सुख, भोग विलास की सामग्री, विषय एक हिन्दी शब्द है, उसका अर्थ किसी एक जैसे संबंध वाली सामाग्री या बातें हैं, इसी प्रकार नाना प्रकार के विषयों की सम्मेलना के पश्चात् किसी विषय का विनिर्माण होता है.
पार्थ- (लगभग गुलाबी पानी दिमाग से उतारते हुए) बे सीन को ज्यादा क्रिटिकल न बनाओ, नयी वाली हिंदी में बताना नहीं आता क्या, कहाँ गरुण पुराण लेके बैठ गए
मैं यानि मोहनवा- (नयी वाली हिंदी का ट्रांसलेटर इंस्टाल करते हुए) हे पार्थ ! (इसका उपाय देने में नयी वाली हिंदी अक्षम) देखो बे जाओ क्रिकेट देखो, इंडिया मैच हार गया, बिहार में दारू बैन हो गयी, पुलिस कमिश्नर बदल गया, लालू जेल चला गया, तैमूर और मिशा में कट्टी हो हई है, पुराने सीएम ने टोटी चुरा ली, और हाँ प्रतिवाद का नया अर्थ अतिवाद हो गया, लाल वाले झंडे को उठाने में तीन रंगों वाला गिर गया, कानून की परिभाषा बदल गयी, विकास का बच्चा खो गया, सुनो बे दिमाग का अंतिम संस्कार न करो, सन्नाटे में निकल लो.......
क्रमशः
#Anuragvaani
शुक्रिया ❣️🙏
(चित्र : स्वयं खींचित - प्रतीकात्मक ब्रह्म लोक)
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