तुम मेरे प्यार का पुण्य धाम
अगर समेट सकता तो समेटता तुमको अपनी हथेलियों पे, और तमाम उम्र के लिए जुदा नहीं होने देता, पर मेरे हांथों में शायद अफसोस के सिवा कुछ नहीं सिमट सकता,
तुम मेरी परिभाषा में प्रेम का पुण्य धाम हो और मैं तो तीरथ का प्रतिबिंब भी नहीं, तुम्हारा दिल उजालों का तेज पुंज है, प्रेम गंगा का भगीरथ हो,
आंखें उलझनों की उन्नति का सोपान हैं, और मैं अपने मूल से उठ तक ना सकने वाला पारा हूं, सदियां बीतने पर भी ना बदलने वाला अविचल पर्वत हूं, मुझे अपने कंठ से आर्त गाना अमरत्व के प्रसाद के रूप में मिला है,
पुष्प का वृक्ष बन कांटो से लिपटे रहने का वरदान मिला है, मुझतक आकर बस तुम्हारी प्यास बुझ सकती है, तृप्ति के लिए मुझमें डूबना होगा,
और तुम तो रेलगाड़ी सरीखी हो और मैं दुष्यंत का पुल जिसपर से तुमको अपने सफ़र ए मुकाम तक जाना है और मुझे रह रह के सिहर जाना है थर-थराना है, उसके आगे तुमको रुकना भी है पर मेरे कहने पर नहीं तुम्हारी मर्जी पे,
मैं मात्र दर्पण का पट हूं और तुम उसपर छाया घना प्रतिबिंब हो जो थोड़ी देर बाद हट ही जाना है किन्तु मुझे तो बस निहारते रहना है,
अच्छा सुनो जब तुमने मुझे प्यार किया और मुझे करना सिखाया, तो समझा कि दुनिया को प्यार की कितनी जरूरत है, हालाँकि दुनिया पहले भी चल रही थी, पर अब सफर करती है वह मेरे भीतर,
मैं अक्सर सपने में देखता हूँ खुद को भागता हुआ जंगल के बीच से पर फिर तुमने मुझे थाम लिया
जैसे धरती भरोसा है पेड़ों का,
जैसे पेड़ भरोसा हैं पशु-पक्षियों का अपने भरोसे में तुमने मुझे भर लिया, अब मुझे किसी के भरोसे की जरूरत नहीं है
लेकिन यकीनन हम जरूर देखेंगे वह दिन जब सृष्टि उतनी ही स्वाभाविक होगी जैसी वह अपनी रचना के पहले दिन थी, प्यार उतना ही स्वाभाविक जब प्यार नहीं था, जब दिल उतना ही स्वाभाविक रूप से परेशान होगा जितना तुम्हारे प्यार से पहले था, और हां इतना ही प्रासंगिक होगा जितना भूत से शुरू हो वर्तमान में रहकर भविष्य के गर्भ में रहने की कल्पना है
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