इश्क मुबारक

इश्क कोई पाकीज़ा चीज़ है अलग घटना है या बस दुनिया की तमाम घटनाओं की तरह ही बस हो ही जाती है, सवालों में उलझ के ही रहना होता है अक्सर कि तमाम चेहरों के होते हुए भी क्यूं किसी कि नजर, किसी की आसक्ति, किसी की चाह किसी एक चेहरे पे ही आ के थम जाती है, तमाम दुनिया में सफर कर चुकी निगाहें कहीं थम जाना चाहती हैं, आखिर क्यूं

दरअसल, खुदगर्ज से भी खुदगर्ज तबीयत का इंसान जिसने तमाम जिंदगी मैं से आगे नहीं सोचा वो न जाने क्यों ठहर जाता है एक तुम पर, सौंप देता है अपना सब अस्तित्व, अपना पूरा आकार जिसको बनाने में उसे तमाम उम्र और तमाम जिंदगी लगी होती है, वह मैं के अहम में डूबा इंसान तुम पर आकर इस कदर तुम डूब जाता है, इस कदर मजबूर हो जाता है कि जैसे समुंदर से निकले तूफान के आगे एक टूटी हुई कश्ती का मुसाफिर, जैसे अंधड़ के आतप से बच पाने की अंतिम आस लिए कोई राहगीर खुद को ना बचा पाए

मुझे नहीं मालूम इश्क आबाद करता है या इश्क बर्बाद, इश्क अपनी कैद में समय पता है यह तमाम दुनिया की आजादियां सौंप देता है, काफिर ओ मोमिन बना देता है, तमाम दुनियावी जन्नतों को कुफ्र में तब्दील कर देता है, इन सवालों से आगे तो वो नहीं बढ़ पाए जिन्होंने बस उस तुम की चाहत में पर्वत चीर दूध बहाने की कसम ले ली और जब नहीं मिली तो तो उसी रास्ते से लहू की धार बही, वो नहीं बढ़ पाए जिन्होंने मोहब्ब्त की रस्मों कसमों से आगे बढ़ दुनिया के रीति रिवाजों के आगे तन के खड़े हो गए, आसानी से कहूं तो आज तक कोई इस सवाल का जवाब कोई नहीं दे पाया, और मैं भी इस जवाब को ढूंढने में कुछ भी जाया नहीं कर सकता, बस मुझको तुमको सबको इश्क मुबारक, 

जाते जाते वो मनोज का शेर कि
तुम ही मेरा आसमान हो, चांद हो, मेरा नूर हो
तुम मेरी पहली मोहब्बत ना सही आखिरी जरूर हो

Comments

  1. बुलाती है, मगर जाने का नहीं यह दुनिया है, इधर जाने का नहीं मेरे बेटे मेरे बेटे, इश्क कर मगर हद से गुजर जाने का नहीं....

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