सत्य का सत्य
कई कहानियाँ सत्य से बहुत दूर होती हैं, इतनी की वो कभी वहाँ तक पहुँच नहीं सकती,
पर
उसी कहानी का कोई किरदार इतना बागी होता है,
की वो इस सत्य को मानने से इनकार कर देता
है की वो सत्य से दूर है, वो कहानी और सत्य की दूरी को दूरी नहीं बल्कि जोड़ने वाली
कड़ी मानता है,
जैसे वो कहते हैं न पहाड़ियों को बस पुल ही नहीं जोड़ते खाई भी जोड़ती है,
वो मान बैठता है अगर सत्य दूर है तो कभी पास भी रहा होगा न, बिना पास से दूर गए कैसे
पता चला की दूर क्या है और पास क्या ?
वो किरदार सत्य की प्राप्ति की जली हुई ख्वाहिशों की राख को छूकर उनको पुनर्जीवित
करने की ठान लेता है, और इस धुन में उसे कहानी का बागी करार दे दिया जाता है,
उसको
सजा दी जाती है.. कहानी से दूर होने की अथाह
दूर होने की, ये जानते हुए की उसके बिना कहानी अधूरी होगी,
उसकी सत्य और साश्वत प्राप्ति
को बदतरज हवस और बेइंतेहा की जिद करार दे दिया जाता है.
लेकिन सत्य के प्रति क्या उसका प्रेम गलत है,
क्या मात्र सत्य की चाह ने उसे इस
कदर गलत ठहरा दिया, उसने तो सत्य का अभास भी नहीं किया था, उसके पास सत्य से प्रेम
करने या, न करने का कोई कारण ही नहीं था, सत्य तो स्वयं आया था न,
उस बागी ने भी सोच
था उस सत्य के भाव के मात्र मोती सजाकर पूरी कथा को सजाना था, किन्तु उसे क्या पता
था की वो सत्य सम्मोहन और प्रेम का जाल लिए बैठा है, जो उसके मन हृदय को एक डोर से बांधे खींच लेगा
खैर वो किरदार भी कहानी से बागी हो सत्य की राह पर अनंत काल का मुसाफिर बन बैठा,
खुद को ये दुआ देता हुआ की कभी उस सत्य की मंजिल उसका हासिल न हो,
क्यूंकी कभी कोई
कहानी और उसका कोई किरदार सत्य के करीब हुआ करता था जिसने उससे अलग होकर दूरी की परिभाषा
गढ़ी, खैर कौन जाने..
दुआओ के असर उम्मीद, इंतजार
और सफर का प्रतिफल,
सत्य, प्रेम, करुणा, हवस और जिद का सत्य..
उसको जानने की आस में बैठा बागी
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