मोहब्ब्त और साड़ी का फाल
शायद तुमको मुझसे अलग होना है इसको अगर यूं लिखा जाए की हमको हमसे अलग होना है तो भी गलत नहीं, शायद तुमको मेरे साथ घुटन होती होगी दरअसल बहुत सारी जिंदगियाँ जीने के बाद अब जो जिंदगी फिलहाल मेरे हिस्से आई है वो ऐसी ही है , मुझे पता है मेरे साथ मुस्कुरा नहीं सकता कोई, पर तुम्हारी मुस्कान के लिए हर जतन किया है, खुद को साड़ी के उस फाल की तरह फ़ैला लिया जिसको साड़ी की खूबसूरती की वाह वाह का तृण मात्र भी नहीं मिलने वाला पर.. शायद दुनिया इससे अनजान है कि हर किसी की चाहत वो पायल की रुन झुन.. उसे सबसे करीब से सुनने का मौका साड़ी के उस गौण फाल को ही मिलना है.
मेरा तुममें मिलके गौण हो जाना ही मेरी सफलता की अंतिम सिद्ध प्रमेय होनी चाहिए, और जब कभी हमारे जीवन मे कठिन प्रश्न उभरें तो वो प्रमेय उसके हल का कारक बने, वो प्रमेय प्रेम की पाठशाला की सूक्ति प्रमेय बने, जब मुस्कुराहट पेचों में कहीं फंस के बाहर निकल रही हो तो तो वो प्रमेय पुनः से मुस्कान को उसके नैंसर्गिक रूप में बाहर निकाले, जो सृष्टि की तमाम वेदनाओं का हरण कर ले.
ये बात भी सिद्ध है की तुम मुझसे प्रेम करो इस बात की प्रायिकता ऋण में आएगी किन्तु प्रायिकता का कोई मान तो है यही इतना मेरे प्रेम के संबल के लिए पर्याप्त है और मान का क्या है इसको कभी भी बदला जा सकता है, प्रेम तुम करो या मैं मेरे लिए इसमे कोई खास भेद नहीं है, क्यूंकी प्रकृति का सास्वत नियम है क्रिया की प्रतिक्रिया, और फिर तो प्रेम प्रकृति का सबसे सास्वत अंग है, तो फिर गणितीय फलन में भी मेरा प्रेम खतम होता तो नजर नहीं आता.
तुम धर्म हो मेरा, मेरी आस्था, ईमान सब हो, सौभाग्यशाली है प्रेम मेरा.. जिसकी आस्था को ऐसा आलंबन मिला जिसपर तमाम उम्र अपना सब कुछ अर्पित, समर्पित किया जा सकता हो, जिसके सम्मुख निश्चल हुआ जा सके, और यदि कभी नेत्र विह्वल हों तो प्रेमाश्रु भी समर्पित किए जा सकें, तुम्हारे सम्मुख बैठना शून्य को साधना है, तुम्हारे प्रेम में समर्पण की नई परिभाषाएं गढ़ी जा सकतीं हैं, और यकीन है तुम्हारे बिना मैं इस दुनिया के अनछुए प्रेमाध्यायों से भरे पोथों के दर्शन नहीं करवा सकूँगा.
प्रेम का गणितीय आकलन विलक्षण ही है। बेहतरीन लेख🙏
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