पहली दफा का इश्क : घनघोर इश्क

पहली दफा इश्क हुआ, इश्क ना हुआ बवाल हो गया, मानो सही में कर्बला की लड़ाई हो गया, मतलब रणविजय सिंह वाला घनघोर इश्क, जौन साहब कहें तो एकदम खून थूका गया, गुलज़ार साहब कहें तक बस कितने दो हैं सरीखे इश्क के सारे रंग एक ही बारी में दिखा डाले...

मतलब यों हुआ कि किसी पुल पर बैठे थे, कोई आया, हांथ थामा और लेकर चल पड़ा और इतनी भी फुर्सत ना मिली कि सोच सकें या इतना तो पूंछ सकें हो कौन तुम, बस सफर की मौज के कुछ यूं हुए कि कुछ भान ही ना रहा कि ये सफ़र ख़तम भी हो जाएगा, ये हमसफ़र जो मेरा है, जिससे मैं-वो मिलके हम बने है उसमे से 'ह' रह जाएगा 'म' चला जाएगा, अंदाज़ा ही नहीं था कि अगर हम का 'ह' चोरी हो जाए तो 'म' कितना बेचैन हो जाता है
वो तो ऐसे ही हुआ कि तुम सफर में थे अचानक तुमको बताया जाए कि बस तुम्हारा सफर यहीं तक था, उतरो...

उस इश्क के हिस्से मुकम्मल होना नहीं आया, पर जो आया वो आज तक जहन को कचोटता है, क्या इश्क के हिस्से अंत में सदैव अपूर्णता, खालीपन और बर्बादी ही आते हैं, और अगर आते भी हैं तो क्यूं ?

आज सड़क चलते मुस्कुराने की हिम्मत तो आ गई है, लोगों से बात करने की तमीज भी आ गई है, मिला जुला कर जमाना बर्दाश्त कर सके ऐसे वाले आदमी भी बन गए हैं, पर जैसे तुम गए थे... ऐसे एकदम आंखों के सामने से, एक पल को मौका भी नहीं दिया था अलविदा कहने का, बिल्कुल ऐसे जैसे शिशु के मुख से उसकी मां का पहला दूध छीन ले कोई तो उसकी कमी वो शिशु उमर भर महसूस करता है, वैसे ही गए तुम... एकदम जैसे तुम इस जहां के थे ही नहीं, ऐसे जैसे तुम मेरे थे ही नहीं...

बहरहाल, तुमसे निकल कर कई दफा कोशिशें कर चुका हूं, कारवां ए दुनिया में शामिल होने की पर... शायद कारवां ए जहां मेरे काबिल ही नहीं, क्यूंकि हम तुम्हारे काबिल थे तो जमाना क्या ही नाकाबिल कहेगा हमें... ख़ैर जैसा तुम छोड़ के गए थे उससे आगे निकलने की कोशिश में अब भी आखिरत तुम में ही सिमट जाता हूं...

आखिर में बस तुम्हारे लिए...

तबीयत से फकीर थे एकदम
एक मूरत ने पुजारी बना दिया ❣️

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