क्यूं लिखा मालूम नहीं
रात के बारह या एक बजे के आस पास नींद आती है, कई बारी उसके भी बाद तबतक कुछ पढ़ता हूँ जिसको ऊल जलूल ही कह लो मानने के लिए, इसी दरम्यान फिल्में देखता हूँ आजकल हर रोज कोई नई बाकी सामान्य दिनों रिपीड पर कुछ चुनिंदा फिल्में , नुसरत साहब के गाने सुनता हुआ उनमें कई अर्थ निकालता बैठता हूँ, कई बारी वहीं से बहुत कुछ लिखने लायक मिल जाता है.
साथ में एक डायरी है जिसमें अक्सर वो सब लिखने की कोशिश होती है जो किसी से कह नहीं पाता और बातें भूलने की आदत के चलते भी कई बारी नोट्स के तौर पे लिख देता हूँ, और कुछ फ़ोटोज़ हैं जिनको रीपीट मोड पे लगभग हर रोज देख कर बहुत कुछ जो बीत चुका है उसको जीने की साजिश मे बिना वजह खुद को धकेलता हूँ.
सोने से पहले चाय और पार्ले बिस्किट तलाशता हूँ और चूंकि मेरे कमरे से किचन के रास्ते मे घर की ड्योढ़ी आती है जहां मम्मी सोती हैं तो उनकी नींद मे भी खलल डालता हूँ, रात को वो डांट समझ नहीं आती पर अजीब लगती है, दिन भर काम की शक्ल में बहुत कुछ फिजूल करता रहता हूँ, सोशल मीडिया की जीवन में जगह उतनी ही है जितना सोशल मैं अपने आप को मानता हूँ, ट्विटर और फेसबुक बस मजबूरी के साथी होकर रह गए हैं, इंस्टाग्राम पर जाना साथियों की मजबूरी के सिवा और कुछ नहीं.
व्हाट्सअप पर जाना जैसे रिवाज बन गया हो इसी मजबूरी के चलते दो व्हाट्सअप का उपयोग करना पड़ता है, फिर भी कई बारी चाहते हुए या ना चाहते हुए बहुत सारे संदेश अपठित रह जाते हैं, जिनकी शिकायतें भी समय समय पर आ जाती हैं, माफी मांगकर आगे से ऐसी गलती न करने की चेष्टा में कुछ कुछ हो जाता है जिसका हिसाब रख पाना कठिन है, काम के नाम पर वही करता हूँ जो पसंद आता है, जिसकी वजह से कई बारी लगता है करिअर का क्या होगा पर भविष्य की चिंता करके वर्तमान की मनमौजी को बर्बाद नहीं करना चाहता हूँ.
आसपास लोग कम नहीं वरन ना के बराबर हैं और आमतौर पर किसी से बात नहीं करता, फोन की घंटी से डर लगता है, बात करने पे पता चला फ़ोनोफोबिया आजकल चल रहा है तीस मिलियन लोग शिकार हैं, किसी से बात करता हूँ तो दिल दुखा देना आदत में शामिल हो गया है चाहता भी हूँ, समझता भी हूँ, इस तरह से रिश्ते नहीं चलते, खोना पाना चालता रहता है मुझे भी आगे लोगों की जरूरत पड़ेगी जनता हूँ पर अभी दुनिया और धूल उड़ाने और संभालने के फरक को न समझ पाने की अयोग्यता के चलते यही है.
खुद को देखूँ तो हर रात में सोने से पहले गहन नैराश्य घेरता है, मैं जितना कर सकता हूँ उससे कहीं कम कर पाने की छटपटाहट हर रात नींद को खा लेती है, तर्कों से हर बारी खुद के पक्ष में सब समेट लेता हूँ पर अपने सरल इंसान होने को खोता रहता हूँ, और तिनका तिनका लोगों को भी उनको समेटना चाहता हूँ पर पता नहीं क्या है, हर कोशिश के आखिर में परिणाम उलट ही मिलता है.
फिर दो ही रास्ते बचते हैं या तो छोड़ दो या संघर्ष करो, उस समय किसी का कथन याद आता है जब सारे गिव अप कहने वाले सही में गिव अप कर देंगे तो दुनिया का क्या होगा बस उसी के बाद पुनः संघर्ष शुरू हो जाता है सब समझता हूँ पर चीजों से भाग पाना नामुमकिन है पता है ऐसा रहा तो आखिर में अकेला बचना पड़ेगा पर अभी इसकी फुरसत नहीं हैं जब थक जाऊंगा तब का देखा जाएगा.
(मुझे झेलने वालों का शुक्रिया)
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