प्रेम प्रमेय

तुम्हारी नाक से निकलती सांस की गर्मी और आँखों और होंठों के मध्य तारतम्य बिठाती कंपन इस बात की गवाह थी कि हम कितने करीब थे।  

बगल से गुजरते हुए तुम्हारी बाईं कलाई को खींच कर अपने बेहद करीब कर लिया था मैंने तुम्हारी कलाई जिसकी घड़ी मेरे हाँथ में बंधी घड़ी से टकराई और यूं इशारा किया कि आज वक़्त एकदम सही है तुम्हारे मेरे यानि हमारे इतने करीब होने का। 

तुम्हारे माथे पर उभर रही रेखाएं इस बात का सुबूत थीं की मेरी कलाई पर पकड़ कितनी मजबूत थी, वो महज तुमको रोक लेने की आकांक्षा से प्रेरित नहीं थीं, बल्कि कलाई पर धड़कती नाड़ियों के सहारे आभास करवाना था मेरे हृदय और देह की हर नाड़ी में बहने वाली तुम का।
                    [चित्र पर पूरा कॉपीराइट है]

तुम्हारे पाँव की उँगलियाँ जूतियों में कसमसा कर रह गईं थीं, और कर भी क्या पातीं बिचारीं आज पहली बार चलते चलते यूं रोक ली गईं थीं जिनमें उनकी मर्जी नहीं बल्कि सदियों की आकांक्षा शामिल थी। 

तुम्हारी भौहों की सिकुड़न तुम्हारे हृदय स्पंदन की गति का पर्याय बन गईं थीं, तुम्हारी आँखों में चमकता मोती सरीखा पावन जल इस दरस की प्यास और निगाहों की अरदास खुद सुना रहा था। 

तुम्हारी उंगलियों का मेरी उंगलियों के बीच तिल तिल कर खुद को जकड़ना किसी रहस्यमय प्रमेय के सुलझने के अनुक्रम और व्युत्क्रम को स्पष्ट अनुभूत कर रहा था....

(लिखना हर बार तुमको जरा जरा जीने के सिवा कुछ भी नहीं, साथ में उन अहसासों को फिर से जीने की एक कोशिश जिसको जीने की आकांक्षा में हम सदियों जियेंगे )

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