अक्टूबर : निर्मल वर्मा की कहानियों सी उदासी वाला महीना
मनवा रोया सा बेकल हवा सा, जलता जियरा चुभती बिरहा, सजनवा आ जा नैना रो रो थके।
अक्टूबर कमाल है, बेवजह भी यहां आकर दिल दुखाने को जी चाहता है। दिसंबर के दर्द तक जाने की सीढ़ी अक्टूबर कमाल है। यहां आकर, बिना पूरे पतझड़ के भी पत्तियों के दिल में किसी दिन त्याग दिए जाने का भय बैठ जाता है। अक्टूबर आते ही रातों का स्याहा बढ़ जाता है, और उदासियां अपने हुनर के शबाब पर होती हैं। असल में सर्दियां इतनी नहीं होती कि हाड़ कंपा दें, मगर जिनके पास दिसंबर की तैयारी नहीं होती अक्टूबर उनकी रूह कंपाने के लिए काफी है।
अक्टूबर का बिरह अजब है। या यूं कहूं विरहियों के लिए अक्टूबर सबसे मुफीद महीना है। अक्टूबर उल्टी गिनती की पहली गिनती है। खालीपन यहां से शुरू होता है। इंसान यहां आकर जोड़ घटाव का हिसाब उंगलियों पर लगाना शुरू कर देता है। साल भर में क्या पाया, क्या गंवाया! साल के अंत यानी दिसंबर तक जाते-जाते क्या क्या हासिल कर लिया जाएगा और क्या-क्या गंवा दिया जाएगा। सब का हिसाब हथेलियों पर साफ दिखता है।
अगर और कहूं तो अक्टूबर लावारिस है। जो ना गर्मी, ना सर्दी, ना बारिश, किसी का नहीं है। कुछेक दिल भी लावारिस होते हैं। जो पूरी तरह से किसी के नहीं होते, या यूं कि कोई पूरा का पूरा उनको स्वीकार ही नहीं कर पाता। कैलेंडर में अक्टूबर भी ऐसा ही है। शुरुआत मद्धम गर्मी से होती है, और आखिरी तारीख तक इतनी सर्द हवा चलनी शुरू हो जाती है, कि हमें एहसास होने लगता है कि अक्टूबर की लावारिसियत के दिन लद रहे हैं। किसी पूरे के हिस्से जाने की तैयारी कर चुका है हमारा अक्टूबर, मगर हम लावारिस फिर भी छूट जाएंगे।
अक्टूबर किसी लंबे उदासी भरे उपन्यास या कई हिस्सों में बटी दिशाहीन वेब सीरीज की तरह है। जिसका रोमांच हर कदम पर उत्साहित करने वाला है। किंतु परिणामतः डायरेक्टर की किसी अयोग्यता के कारण यथोचित या आशान्वित गंतव्य तक नहीं जाता। अक्टूबर का आवारापन, अलग और तमाम रोमांच और हर दिन के नए पन के बावजूद भी ना जाने क्या है जो उसको लंबी उदासी का प्रतिमान बनाता है जो उसकी नियति के सिवा कुछ नहीं है।
अक्टूबर-दिसंबर की नींव है जहां जाकर सब कुछ खत्म हो जाता है। संभव है मेरी लेखनीय अयोग्यता इसको बयां ना कर पाए। लेकिन अक्टूबर की दिसंबरियत इसको और उदास बनाता है, जैसे जिस्म से किसी वर्तमान प्रेमिका के पास होना और रूह से वहीं होना जो कभी हमारा नहीं हो सका। किंतु अक्टूबर का दुख इससे भी बड़ा है क्योंकि इसके हिस्से सब कुछ थोड़ा-थोड़ा आया है। अक्टूबर का दुख महज ना पाने का दुख नहीं है। अक्टूबर का दुख है थोड़ा पाने का और फिर सूत समेत सबकुछ खोने का।
अक्टूबर सेतु है, चाहे जीवन का हो चाहे मौसम का जहां हर पल गिरने और खोने के सिवा सबकुछ निर्जीव है।
उदासी भी...
वाह! अक्टूबर को देखने का एक अलग नजरिया, कुछ पंक्तियाँ तो मालूम होती थी जैसे ये तो मेरे भी जहन में आया ख्याल है।
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया
Deleteअक्टूबर तो किसी शख़्स सा लग रहा... कुछ कुछ मुझ सा भी..😄😝
ReplyDeleteहम सब अपने भीतर एक अक्टूबर लिए घूम रहे हैं जो सितंबर और नवंबर के बीच कहीं गुम है...
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