टेसू के फूल


 तुम्हारे  संग की लगभग सब बैठकें याद हैं।  हमने रास्ते, चौराहे, पार्क के कोने सब जगहों पर अपनी बैठकों के साथ बैठे वक़्त को वहीँ ठहरा हुआ छोड़ रखा है। वो सब इसी इंतजार में हैं कि, एक दिन हम लौटेंगे और छूकर उनको फिर से चला देंगे। हम दोनों में से कौन अपनी भौंहें ज्यादा बार हिला सकता है इसकी प्रतियोगिता हुयी थी। मैं ज्यादा बेहतर कर पाया था शायद, लेकिन तुमने उछल उछल कर कहना शुरू कर दिया मैं जीत गयी। पता नहीं उस वक़्त ये सब इतना मामूली क्यूँ लग रहा था, और आज इस कदर याद आता है कि जहाँ रहता हूँ बस बैठ जाता हूँ, और नहीं खोना चाहता उस अतीत के सपने को, मेरी सब उम्मीदें इन्हीं छोटे छोटे सपनों टिकी हैं। 

छोटे सपने कई दफ़ा इस कदर हावी हो जाते हैं कि, उनके बीत जाने का मलाल किसी सुरूर जैसे जेहन पर चढ़ता है। जैसे कोई तितली किसी फूल से लिपट जाती हो, और वक़्त कैफ भोपाली के लफ्ज़ और जगजीत सिंह मखमली आवाज में लिपट जैसे मुझसे कहता हो, "गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो / आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा"। मैं इस याद की तितली को कभी खुद से जुदा नहीं कर पाउँगा। 


चलते चलते एक दूसरे की उँगलियों को छू लेने की हसरत, आज प्यास बनकर मेरे गले पर हावी हो जाती है। मैनें तमाम दुनिया से हाथ मिलाया, पूरे हाथ इन हांथों में आये लेकिन, तुम्हारे हाथों की उँगलियों के छू भर जाने से मचने वाली सिहरन का कोई जवाब नहीं। केदारनाथ सिंह ने इस एहसास को बहुत पहले की अल्फाज़ दिए थे कि, 

उसका हाथ

अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को

हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.

इतना सुन्दर मैंने कभी महसूस नहीं किया, टेसू के फूल आकर्षित करते हैं मगर उनमें भी वो लज्ज़त नहीं जो तुम्हारी मोटी हथेलियों में बसी रेखाओं पर नाख़ून के फेरे जाने में है। 


सुन्दरता कभी पैमानों में नहीं रही, तुम्हारे होठों पर हज़ारों कलाम लिखने के बाद भी उनके बीच से फूटती हंसी जैसा कुछ नहीं लिखा पाउँगा। मेरी वर्षों की साधना, तुम्हारी तनिक भर मुस्कान के सामने बौनी है। एक चेहरा जिसको देखकर मेरी सुबहों और शामों का स्वाद तय होता था, उसको कैसे किसी शब्दों के जाल में बसाकर बयाँ कर सकूँगा। तुम्हारी तस्वीर स्क्रीन पर लिए घंटों निहारता हूँ, एक तस्वीर है जिसमें तुम्हारे बाल, गाल से होते हुए होंठों तक आ गये हैं। जितनी बार भी देखता हूँ तो कोशिश करता हूँ उनको तुम्हारे होठों से हटाकर कान के पीछे पहुंचा दूं, तुमको परेशां कर रहा होगा। नेपथ्य में बजता जगजीत साहब की आवाज में ये गीत, "तेरी तस्वीर से करता था बातें / मेरे कमरे में आईना नहीं था" मुझको न जाने तुम्हारी कजरारी आँखों के कितना भीतर ले जाता है। और सोचता हूँ अगर ये आँखें उम्र भर साथ रहें तो किसी आईने की क्या ही जरुरत होगी।


उन के देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक़ 

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है 


मिर्जा ग़ालिब ने तुम्हारे लिए ही लिखा होगा। तुम्हारे होने से गुस्सा थोडा कम मालूम होता है, प्यार करने के रटे रटाये तरीके भूल जाते हैं। मोहम्मद रफ़ी की आवाज कहीं दूर से सफ़र करती हुयी आती है और मुझे अधीर होता देख कहती है -


तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

ये उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढले

मेरा जीना मेरा मरना इन्हीं पलकों के तले

तेरी आँखों के सिवा ... 


शायद हाँ ! कुछ नहीं रखा तुम्हारी आँखों के सिवा !

Comments

  1. "वर्षों की साधना तनिक भर मुस्कान के आगे बौनी"
    वाह क्या बात कही है..👌

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